एक दूसरे के प्रति वात्सल्य बढ़ाइए – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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आज पाठशाला में बात करते हैं वात्सल्य की। आज परिवार, समाज में क्यों एक दूसरे के प्रति वात्सल्य कम होता जा रहा है? जहां पर यह दिखाई देता है वहां भी कहीं ना कहीं वात्सलय में स्वार्थ छिपा दिखाई देता है। वात्सल्य नही होने से एक दूसरे के प्रति विश्वास कमजोर होता दिखाई दे रहा है। जो विश्वास कर रहा है वह भी यही सोच कर कर रहा कि कहीं परिवार ना टूट जाए। जमाना ही ऐसा है, विश्वास तो करना ही होगा नहीं तो हम क्या कर सकते हैं। यही सब बातें 99 प्रतिशत मनुष्यों के मन में रहती हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि यह सब बातें मन मे आती है तो एक दूसरे के प्रति विश्वास कहां हुआ?
वात्सल्य की जननी है संयुक्त परिवार। आज ये परिवार समाप्त हो गए हैं। संयुक्त परिवार में जहां पर सब एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, एक साथ घूमने जाते हैं, पूरा परिवार साथ बैठ कर मनोरंजन करता है। एक साथ त्योंहार मनाता है। एक दूसरे अपने सुख-दुख बांट सकता है। क्या आज यह सब हो रहा है? आज कहीं संयुक्त परिवार मिल भी जाए तो देखने में आता है कि सब का अपना अपना कमरा है, सब का अपना भोजन है, साथ हैं भी तो भोजन करने का समय अलग-अलग है। मनोरंजन के लिए अपने कमरे अपना टीवी है। परिवार में किसी एक का दोस्त, रिश्तेदार आ जाए तो दूसरा उसके साथ बैठना नहीं चाहता। उसे लगता है कि कहीं दूसरा बुरा ना मान जाए। कोई बैठ गया तो सामने वाला सोचता है कि जाने का नाम ही नही ले रहा।
यह अब इसलिए हो रहा है कि हम यह मान कर चलने लगे है कि हमारी अपनी जिंदगी है और उसे हम जैसे चाहे जिएंगे, लेकिन सोचिए….इस सोच के साथ हम बच्चों को क्या और कैसे संस्कार दे पाएंगे? इन सब का दुष्परिणाम दिखाई भी दे रहा है।
मैं तो यह कहना चाहता हूं जो कोई बात आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ शेयर नही कर सकते हा तोे इसका मतलब है कि उस बात में वासना है। वह वचन सभ्य नही है, या फिर आपके मन में ही कोई दुर्भावना है। वात्सल्य, विश्वास समाप्त होने के कारण ही आज समाज में वृद्धाश्रम खोलने की जरूरत पड़ने लगी है। इन स्थितियों पर विचार कीजिए…..

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