दिल की बात:-‘अनेक नहीं एक संगठन बनाएं, ताकि एकता बनी रहे’-अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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आज नगर-नगर में हमारा समाज बंट रहा है। समाज का विभाजन हो रहा है। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन एक प्रमुख कारण यह है कि हर नगर में सामािजक कार्यों, धार्मिक गतिविधियों आदि के नाम पर अनेक संगठन खड़े हो गए हैं। कई मंच बन गए है। राष्ट्रीय मंचों और संगठनों की अनेक शाखाएं बन गई है। कुछ लोगों को लगता होगा कि इससे समाज का भला हो रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। इससे समाज बंट रहा है। इसका वातावरण दूषित हो रहा है और इन परिणामों के कारण हम आपस में अपने सम्बन्ध खराब कर रहे हैं।
किसी भी नगर में कोई काम होता है। कोई बड़ा आयोजन किया जाता है तो उस कार्य में जितनी सफलता मिलनी चाहिए। उस काम जो उंचाई मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाती है, जबकि इस काम में समाज के लोगों का पैसा भी लगता है, मन भी लगता है, तन भी लगता, लेकिन परिणाम जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं मिलता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारी उर्जा, हमारी ताकत बंट जाती है। एक संगठन कोई काम करता है तो दूसरा संगठन उससे जुड़ता नहीं है, बल्कि उसकी आलोचना शुरू कर देता है और इससे मनभेद हो जाता है।
समाज को मजबूती प्रदान करने के लिए हमारे विचारों में अंतर हो सकता है। हमारे मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि हम हर नगर में एक नवयुवक मण्डल बनाएं, एक महिला मण्डल बनाएं और एक ही प्रतिनिधि संगठन बनाएं। इसके अलावा कोई ओर संगठन ना बनने दें। राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं से भी हम कार्यकर्ता या उस संस्था के स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में ही जुड़ें। राष्ट्रीय संस्था का कोई कार्यक्रम हो तो आयोजक भले ही वह संस्था हो, लेकिन काम उस नगर का नवयुवक या महिला मण्डल और प्रतिनिधि संस्था ही करे, ताकि हमारी उर्जा एक ही जगह लगे और उस आयोजन को इच्छित सफलता मिल सके।
हम सभी यह संकल्प लें कि अपने नगर में एक ही संस्था बनाएंगे। राष्ट्रीय संस्था से एक कार्यकर्ता के रूप में जुडेंगे। उससे दिशा निर्देश भी लेंगे, लेकिन नगर कोई आयोजन होगा तो यह अधिकृत संस्थाएं ही उसे करेंगी। ऐसा करेंगे तो समाज में एकता बनी रहेगी। इसका अस्तित्व बना रहेगा और है मजबूती रहेगी।

अनंत सागर
अंतर्मुखी के दिल की बात
(बत्तीसवां भाग)
9 नवम्बर, 2020, सोमवार, लोहारिया

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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