स्वाध्याय – 1 : ‘सूर्यास्त पश्चात भोजन विषाक्त कैसे हो जाता है?’ -अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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suryaast pashchaat bhojan vishakat kaise ho jata hai
भारतीय और जैन संस्कृति में साधना, ध्यान, त्याग और संयम को महत्त्व दिया गया है। यह कहा जा सकता है कि इनके बिना भारतीय और जैन संस्कृति की पहचान ही नहीं हो सकती है। साधना सत्य आचरण के बिना अधूरी है। आचरण के बिना मानव अधूरा है । कुल मिलाकर सब एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। संस्कृति का निर्माण संस्कारों से होता और संस्कार का वास आत्मा में होता है। हमारे दैनिक आचरण से ही उन संस्कारों का पोषण होता है। आचरण अनुरूप यह स्वतः तय हो जाता है कि व्यक्ति सदाचारी है अथवा मिथ्याचारी। और क्या आप जानते हैं कि खान-पान से आचरण में सुधार संभव है ? भूख प्रायः सभी प्राणियों को लगती है। जंगल में भी सूर्योदय के साथ ही सभी जीव खाने की खोज में निकल पड़ते हैं और सूर्यास्त से पहले लौट आते हैं। आप जानते ही होंगे,आचरण में रात्रि भोजन को लेकर जैन- हिन्दू धर्म और वैज्ञानिकों का एक ही मत है। रात्रि या देर रात्रि भोजन से मानव में विकार और रोग उत्पन्न होते हैं, भाव निम्न होता है जिसके कारण परिणाम अशुभ हो जाते हैं। सीधे सीधे कहे तो रात्रि में भोजन करने से जीवन में से सुख-शांति और समृद्धि चली जाती है। प्रख्यात फिल्मी हस्तियाँ जैसे अक्षय कुमार, इत्यादि कलाकार भी स्वास्थ्य सजगता के चलते रात्रि में भोजन नहीं करते हैं। इससे संबंधित उनके कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं ।

जैन धर्म की पद्मपुराण में रात्रि के भोजन को लेकर बहुत कुछ कहा गया है उसका कुछ भाग यहाँ समझते हैं।

  • जो रात्रि में भोजन करता है, वह डाकिनी, प्रेत,भूत आदि नीच प्राणियों के साथ भोजन करता है ऐसा माना गया है ।
  • जो रात्रि में भोजन करता है वह कुत्ते,चूहे, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ भोजन करता है, ऐसा माना गया है।
  • संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि जो रात में भोजन करता है वह सब अपवित्र पदार्थ खाता है।
  • सूर्य के अस्त हो जाने पर जो भोजन करते हैं उन्हें विद्वानों ने मनुष्यता से बंधे हुए पशु की संज्ञा दी है ।
  • जो मनुष्य रात्रि में भोजन करता है वह पर-भव में अल्पायु, निर्धन, रोगी और सुख रहित अर्थात् दुःखी होता है।
  • रात्रि में भोजन करने से यह जीव दीर्घ काल तक निरंतर जन्म-मरण को प्राप्त करता रहता है और गर्भवासी होकर दुःख से पकता रहता है।
  • रात्रि में भोजन करनेवाला मिथ्यादृष्टि पुरुष शूकर, भेड़िया, बिलाव, हंस तथा कौआ आदि योनियों में दीर्घ काल तक उत्पन्न होता रहता है।
  • स्त्रियों के रात्रि भोजन को लेकर कुछ अलग कहा है पद्मपुराण में –
  • रात्रि में भोजन करने से स्त्रियाँ अनाथ, दुर्भाग्यशाली, माता पिता भाई से रहित तथा शोक और दारिद्रय से युक्त होती हैं।
  • जिनको नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से युक्त हैं, जो अनेक दुष्ट लक्षणों सहित हैं,। जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती रहती है, जिनके ओठ फटे और मोटे हैं, कान खड़े हैं, सिर के बाल पीले तथा चटके हैं, दाँत तूँबड़ी के बीज के समान हैं और शरीर सफेद है, जो कहानी, शिथिल तथा कान्तिहीन हैं, रूपरहित हैं, जिनका चर्म कठोर है। जो अनेक रोगों से युक्त तथा मलिन है, जिनके वस्त्र फटे हैं, जो गन्दा भोजन खाकर जीवित रहती हैं, और जिन्हें दूसरे की नौकरी करनी पड़ती है, ऐसी स्त्री रात्रि भोजन के ही पाप से होती हैं।
  • रात्रिभोजन में तत्पर रहनेवाली स्त्रियाँ बूचे नकटे और धन तथा भाई-बन्धुओं से रहित पति को प्राप्त होती हैं।
  • जो दुःख के भार से निरन्तर आक्रान्त रहती हैं, बाल अवस्था में ही विधवा हो जाती हैं, पानी, लकड़ी आदि ढो-ढो कर पेट भरती हैं, अपना पेट बड़ी कठिनाई से भर पाती हैं, सब लोग जिनका तिरस्कार करते हैं, जिनका चित्त वचन रूपी बसूला से नष्ट होता रहता है और जिनके शरीर में सैकड़ों घाव लगे रहते हैं, ऐसी स्त्रियाँ रात्रि भोजन के कारण ही होती हैं।

1.हिन्दू धर्म के महाभारत के शांति पर्व में कहा है –

“चत्वारि नरक द्वारं प्रथमं रात्रि भोजनम्॥ परस्त्री गमनं चैव सन्धानानन्तकायिकम्॥” अर्थ – नरक जाने के चार द्वार हैं – पहला रात्रिभोजन, दूसरा परस्त्री सेवन, तीसरा सन्धान अर्थात् अमर्यादित आचरण का सेवन करना एवं चौथा अनन्तकायिक अर्थात् जमीकंद खाना।

2. मार्कण्डेय पुराण में कहा है –

“अस्तंगते दिवानाथे आपो रुधिर मुच्यते। अन्नं मांस समं प्रोक्ततं मार्कण्डेय महिषर्षणा ॥” अर्थ – सूर्य के अस्त होने के बाद जल के सेवन को खून के समान एवं अन्न के सेवन को माँस के समान कहा है।

3. मार्कण्डेय पुराण में और भी कहा है –

“मृते स्वजन मात्रेऽपि सूतकं जायते किल। अस्तंगते दिवानाथे भोजन कथ क्रियते॥” अर्थ – स्वजन का अवसान हो जाता है तो सूतक लग जाता है, जब तक शव का संस्कार नहीं होता तो भोजन नहीं करते हैं। जब सूर्यनारायण अस्त हो गया तो सूतक लग गया अब क्यों भोजन करेंगे। अर्थात् नहीं करेंगे, नहीं करना चाहिए।

4. ऋषीश्वर भारत में कहा है –

“मद्यमाँसाशनं रात्रौ भोजनं कंद भक्षणम्। ये कुर्वन्ति वृथा तेषां, तीर्थयात्रा जपस्तपः॥ वृथा एकादशी प्रोत्ता वृथा जागरणं हरे:। । वृथा च पुष्करी यात्रा वृथा चान्द्रायणं तपः ॥” अर्थ – मद्य, माँस का सेवन, रात्रि में भोजन एवं कंदमूल भक्षण करने वाले के तप, एकादशीव्रत, रात्रिजागरण, पुष्कर यात्रा तथा चन्द्रायण व्रतादि निष्फल हैं।

रात्रि में भोजन क्यों नहीं करना चाहिए?

सूर्य की किरणों में Ultraviolet (अल्ट्रावायलेट) एवं Infrared (इन्फ्रारेड) नाम की किरणें रहती हैं। इन किरणों के कारण दिन में सूक्ष्म जीवों की उत्पति नहीं होती है। सूर्य के अस्त होते ही रात्रि में जीवों की उत्पत्ति प्रारम्भ हो जाती है। यदि रात्रि में भोजन करते हैं, तब उन जीवों का घात हो जाता है, जिससे हमारा अहिंसा धर्म समाप्त हो जाता है एवं पेट में भोजन के साथ छोटे-छोटे जीव-जन्तु पहुँच जाते हैं, जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

अमेरिकी शोधकर्ताओं ने भी मुहर लगाई है

बरसों से भारत की सूर्यास्त पूर्व भोजन की मान्यता पर अमेरिकी शोधकर्ताओं ने भी मुहर लगाई है। दावा है कि यदि आप शाम 6 बजे के बाद भोजन करते हैं, तो इससे मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज का खतरा हो सकता है।दरअसल, जब स्वस्थ रहने की बात आती है तो ‘हम क्या खाते हैं’ के साथ ही यह भी अहम होता है कि ‘हम कब खाते हैं।’शोधकर्ताओं का कहना है कि शरीर अपनी आंतरिक घड़ी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। रात के समय पाचन तंत्र कम लार बनाता है, पेट पाचक रस का उत्पादन कम करता है, भोजन को आगे बढ़ाने वाली आंतें सिकुड़ जाती हैं और हम हॉर्मोन इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाते हैं। शरीर की आंतरिक घड़ी पर शोध करने वाले कैलिफोर्निया के साक इंस्टीट्यूट के प्रो. सैचिन पांडा के मुताबिक, शरीर आंतरिक घड़ी का पालन करता है। चूहों पर हुए शोध के आधार पर दावा किया गया है, इस बात की पुष्टि के लिए चूहों के दो समूहों को एक समान कैलोरी का भोजन दिया गया। अंतर केवल इतना था कि पहले समूह की भोजन तक पहुंच 24 घंटे थी, जबकि दूसरे समूह को दिन के 8 घंटे ही भोजन दिया गया। कुछ दिन बाद पाया गया कि पहले समूह का वजन बढ़ गया था। इस समूह में उच्च कोलेस्टेरॉल और टाइप 2 डायबिटीज जैसे लक्षण दिखने लगे थे। जबकि जिस समूह को तय समय पर भोजन दिया जा रहा था, वह स्वस्थ था। महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई कि दूसरे समूह में टाइप 2 डायबिटीज से लड़ने की क्षमता विकसित हो गई थी। आंतों को मरम्मत का मौका मिलना जरूरी – अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के शोध में बताया गया कि, जो लोग सोने से एक घंटे पहले भोजन करते हैं, वे अपनी ब्लड शुगर शर्करा को उतनी बेहतर तरीके से नियंत्रित नहीं कर पाते, जितने बेहतर तरीके से जल्दी भोजन करने वाले। प्रो. पांडा मानते हैं कि समयबद्ध भोजन सेहत के लिए बेहतर है, क्योंकि इससे आंतों को खुद की मरम्मत का मौका मिल जाता है।बार-बार भोजन का समय न बदलें। रोज पाचन की प्रक्रिया के दौरान आंतों की 10 में से एक कोशिका क्षतिग्रस्त होती है। देर रात भोजन और सुबह जल्दी ब्रेकफास्ट करने से उन्हें मरम्मत और सुधार का कम समय मिल पाता है। इसलिए दिन में भी भोजन का समय तय करें और उसी पर टिके रहें, क्योंकि अप्रत्याशित समय पर भोजन करने से पाचक ऊतक गड़बड़ा जाते हैं। आप सब को यह पढ़ कर एहसास होना चाहिए की रात्रि भोजन हर प्रकार से निषेध है। इसे छोड़ कर श्रावक बनना चाहिए। डॉक्टर कहते है कि पाचन शक्ति कमजोर, निंद्रा, मानसिक रोग, सांस में गंध, दांतो में सड़न,कब्ज, घुटने एवं जोड़ो में दर्द, गले के कई रोग पैदा हो जाते हैं।

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