स्वाध्याय-17 : स्वाध्याय के पांच भेद

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• आलस्य का त्यागकर ज्ञान की आराधना करना निश्चय स्वाध्याय है।
• व्यवहार में स्वाध्याय के पांच भेद हैं ।

1.वाचना – निर्दोष ग्रन्थ (अक्षर) और अर्थ दोनों को प्रदान करना वाचना स्वाध्याय है।

2.पृच्छना – संशय को दूर करने के लिए अथवा जाने हुए पदार्थ को दृढ़ करने के लिए पूछना पृच्छना है।

3.अनुप्रेक्षा – जाने हुए पदार्थ का बारम्बार चिंतन करना अनुप्रेक्षा है।

4.आम्नाय – शुद्ध उच्चारण पूर्वक पाठ को पुन:-पुनः दोहराना आम्नाय स्वाध्याय है और पाठ को याद करना भी आम्नाय है। भक्तामर, णमोकार मंत्र आदि के पाठ इसी में गर्भित हैं।

5.धर्मोपदेश – आत्मकल्याण के लिए, मिथ्यामार्ग व संदेह दूर करने के लिए, पदार्थ का स्वरूप जानने के लिए और श्रोताओं को रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए धर्म का उपदेश देना धर्मोपदेश है।

(तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 9)

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