तीन लोकों में कहीं भी सुख नहीं – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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पापकर्म के प्रकट होने से सीता वन में रो रही थीं और उसी समय पुण्य के उदय से वहां वज्रजंघ आ गया। उन दोनों के बीच जो चर्चा हुई, उसका वर्णन पद्मपुराण पर्व 98 में आया है। तो आओ, उसमें से कुछ प्रसंग को पढ़ते हैं।

कृतान्तवक्त्र सेनापति जब सीता को वन में छोड़ गया तो उसके बाद सीता अपने कर्मों पर रो रही थीं। पुण्डरीकपुर का राजा वज्रजंघ उस वन में आया हुआ था। उसने सीता के रोने की आवाज सुनी। वह हाथी से उतरकर सीता के पास गया। उसने पहले अपना परिचय दिया फिर सीता से उसका परिचय जानने के साथ ही यह भी पूछा कि आप इस वन में क्या कर रही हैं। तब सीता ने वनवास से लेकर वनवास तक की पूरी कहानी सुना दी। यह सुनने के बाद वज्रजंघ ने सीता से कहा, शोक छोड़ो, रो मत, जिन शासन की महिमा तो तुम जानती ही हो। दुःख को बढ़ाने वाला यह कार्य क्यों कर रही हो? तुम्हें मालूम नहीं क्या, इस संसार की स्थिति अनित्य,अशरण,एकत्व और अन्यत्व आदि रूप है। तुम मिथ्यादृष्टि स्त्री के समान शोक क्यों कर रही हो। संसार में इस जीव ने अनेक बार संयोग और वियोग प्राप्त किए है। तिर्यंच योनि में खेचर,जलचर, स्थलचर होकर शीत और आतप आदि से उत्पन्न दुःख सहन किए हैं। मनुष्य पर्याय में निन्दा, गाली आदि से उत्पन्न दुःख सहन किए है । देवों में एक दूसरे की ऋद्धियों को देखकर दुःखी होता है। नरकों में शीत,उष्ण,क्षार जल,परस्पर के दुःख आदि के दुःख होते हैं। कहने का मतलब है, तीन लोकों में कहीं भी सुख नहीं है। आपने तो इस भव में स्त्री पर्याय को धारण किया है। पुण्य के उदय से राम जैसा पति पाया, उनके साथ सुख से समय बिताया और अब पाप के उदय से दुःख प्राप्त हुए हैं। देखो, रावण के द्वारा हरी जाकर तुम लंका पहुंची,वहां तुमने माला तथा लेप आदि लगाना छोड़ दिया फिर राम के प्रसाद से सुखी हुईं, गर्भवती हुईं और अब वापस वन बिना दोष के भी वन में छोड़ी गईं। यह सब पुण्य और पाप का ही फल है। तेरा पापकर्म भी जल्द ही नष्ट होगा और राम तुम्हें वापस ले जाएंगे। इस प्रकार से वज्रजंघ ने सीता को सांत्वना दी।

अनंत सागर
अंतर्भाव
25 जून 2021, शुक्रवार
भीलूड़ा (राज.)

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