स्वाध्याय – 18 : तीर्थंकर विशेष

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कलश : तीर्थंकर भगवान के जन्म अभिषेक के कलश का मुख एक योजन (12 किलोमीटर), उदर में चार योजन और गहराई में आठ योजन का होता है। इस प्रकार के 1008 कलशों से जिनेन्द्र भगवान का जन्माभिषेक होता है।

जन्म की सूचना : तीर्थंकर भगवान का जन्म होने पर इन्द्रों का आसन कम्पित होता है। कल्पवासी देवों के यहाँ घण्टा बजता है। ज्योतिषी देवों के यहां पर सिंहनाद होता है। व्यन्तर देवों के यहां पर भेरी बजती है। भवनवासी देवों के यहां शंखनाद होते हैं।
दीक्षा साथ में : ऋषभदेव के साथ 4000 राजाओं ने, वासुपूज्य के साथ 676 (अन्य जगह पर और कुछ संख्या आती है), मल्लिनाथ एवं पार्श्वनाथ के साथ 300-300 राजाओं ने, भगवान महावीर ने अकेले एवं शेष तीर्थंकरों के साथ एक-एक हजार राजाओं ने दीक्षा ली थी।
समवसरण विस्तार : आदिनाथ भगवान का 12 योजन, आदिनाथ भगवान से नेमिनाथ भगवान तक आधा योजन कम होता जाता है। पार्श्वनाथ भगवान का 1:25 योजन, भगवान महावीर स्वामी का 1 योजन का समवसरण था।
कैसे मोक्ष गए : आदिनाथ भगवान, वासुपूज्य और नेमिनाथ तो पद्मासन से एवं शेष सभी तीर्थंकर खड्गासन से मोक्ष पधारे थे। किन्तु समवसरण में सभी तीर्थंकर पद्मासन में ही विराजमान होते हैं।
पारणा : आदिनाथ भगवान का इक्षुरस से और शेष सभी तीर्थंकरों ने क्षीरान्न अर्थात दूध से बने अनेक व्यञ्जनों की खीर से पारणा किया था।
मुनि अवस्था में उपसर्ग : सुपार्श्वनाथ, पार्श्वनाथ एवं महावीर तीर्थंकर
वर्ण (कलर) : तीर्थंकर चन्द्रप्रभ, तीर्थंकर पुष्पदन्त सफेद वर्ण के, तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ, तीर्थंकर नेमिनाथ श्याम/नील वर्ण के, तीर्थंकर पद्मप्रभ, तीर्थंकर वासुपूज्य लाल वर्ण के, तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ, तीर्थंकर पार्श्वनाथ हरित वर्ण के, शेष सोलह तीर्थंकर पीत वर्ण के हैं।

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