कर्म सिद्धांत : वैरभाव का दुख कई भवों तक भोगना पड़ता है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी

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वैरभाव अनेक जन्मों तक दुःख का कारण बनता है। पद्मपुराण के पर्व 5 में वैरभाव के फल को बताने वाली कथा आती है।

कथा इस तरह है-

राजा सुलोचन और राजा पूर्णधन में बीच युद्ध हुआ। युद्ध का कारण था सुलोचन की पुत्री। सुलोचन अपनी बेटी उत्पलमती का विवाह पूर्णधन के साथ न कर सगर चक्रवर्ती से करना चाहता था। इस कारण युद्ध हुआ जिसमें सुलोचन मर गया। इस भव में दोनों का एक-दूसरे के प्रति वैर हो गया। सुलोचन के पुत्र सहस्त्रनयन और पूर्णधन के पुत्र मेघवान ने अजितनाथ भगवान के समवसरण में जाकर गणधर भगवान से पिता के वैर का कारण पूछा। तब गणधर भगवान कहने लगे भरत क्षेत्र में भावन नाम का वणिक रहता था। वह धन कमाने के लिए अन्य देश जा रहा था। उसने अपना चार करोड़ का धन अपने पुत्र हरिदास को दिया और कहा कि इस धन का उपयोग वैश्या गमन, शराब, जुआ आदि में नहीं करना और अच्छे संस्कारों के साथ रहना। पिता के जाने के बाद उसने धन के अहंकार में आकर अपना सारा धन वैश्यागमन, जुए और शराब में बर्बाद कर दिया। जब सारा धन चला गया तब वह चोरी कर अपने व्यसनों को पूरा करने लगा। एक दिन वह सुरंग के रास्ते धन चोरी करने राजमहल गया, इतने में पिता भावन घर आ गया। उसने पूछा की बेटा कहाँ है तो उसे पता चला कि वह तो चोरी करने गया। पिता बेटे को समझाने सुरंग के रास्ते उसके पास गया। उधर से बेटा आ रहा था। उसे डर लगा कि राजा के सिपाही आ रहे हैं। उसने बिना देखे ही तलवार चला दी। पिता का सिर कट गया। वह मर गए। बाद में उसने देखा कि यह तो उसके पिता हैं। पिता को मैंने मारा इस भय से वह जंगल में चला गया। इस प्रकार पिता-पुत्र मरकर श्वान, बैल, नेवला, भैंसा आदि कई भव में दुःख भोगते रहे। फिर पुण्यकर्म के उदय से पिता भावन का जीव तो पूर्णधन बना और पुत्र हरिदास का जीव सुलोचन बना। गणधर भगवान ने कहा इसलिए तुम दोनों के पिता का युद्ध हुआ।

तो देखा अपने किस प्रकार से वैर कर्म से कई भवों तक दुःख भोगना पड़े।

अनंतसागर
कर्म सिद्धांत
बयालीसवां भाग
16 फरवरी 2021, मंगलवार, बांसवाड़ा

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