बाईसवां दिन : विवादित बातें जोड़ती नहीं, तोड़ती हैं – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 22वां दिन। विवादित बातों पर जवाब देने की प्रवृत्ति मनुष्य के मन, मस्तिष्क को विचलित कर देती है, इस परिस्थिति में नकारात्मक सोच का ही जन्म होता है। विवादित बातें रबड़ की तरह होती हैं- जितना खींचो, खिंचती चली जाती है। पर जब खिंचने की लिमिट समाप्त हो जाती है तो वह टूट जाती है। एक रबड़ के दो टुकड़े हो जाते हैं, फिर वह रबड़ किसी काम का नहीं रहता है। विवादित बातों में मनुष्य की वाणी से निकलने वाले शब्दों की मर्यादा टूट जाती हैं। ऐसा लगता है कि मानव के वेश में वह राक्षस हो।  लज्जा, शर्म, मानवता धीरे- धीरे दूर होते चले जाते हैं।  स्वच्छन्द प्रवृत्ति से वह जीना शरू कर देता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य का अपनी जाति, धर्म, परिवार, संस्कार, संस्कृति के प्रति अभिमान नहीं बचता है। मनुष्य की यह प्रवृत्ति उसे धीरे-धीरे अपने समाज की गतिविधियों से दूर ले जाती है, उसमें नकारात्मक सोच हावी हो जाती है। एक दिन वह अपने परिवार की पहचान और सम्मान को खो देता है।

विवादित बातों का कोई अंत नही होता है। एक जवाब पर फिर एक प्रश्न, इस प्रकार से सिलसिला चलता ही रहता है। जब सवाल- जवाब का अंत नहीं होगा तब तो विवाद बढ़ते ही जाएंगे। यह विवाद ही मनुष्य के चरित्र, ज्ञान,श्रद्धा, विश्वास, सोच, भावना को नीचे की और गिराता ही चला जाता है। मैंने भी कई बार इन बातों का अपनी जीवन में  एहसास किया है।
विवादों से दूर होने के लिए पहला पुरुषार्थ यह करना चाहिए कि विवादित व्यक्ति की संगति न करें, विवादित पुस्तकेंं ना पढ़ें और न ऐसी जगह बैठें जहां विवादित बातें होती रहती हों। पहला यह पुरुषार्थ मनुष्य को सरल, सहज, निर्मल बनाना प्रारम्भ कर देता है।  मैं तो यह अनुभव किया है कि विवादित बातें करने से मनुष्य अपनी विश्वसनीयता को भी नहीं बचा पाता है। जिसकी विश्वसनीयता ही नहीं बची हो, उसका जीना न जीना एक जैसा ही लगता है। वह हर समय अपने आपको अकेला और भयभीत समझता है। विवादित बातें जोड़ने नहीं, तोड़ने का काम करती है। तोड़ने वाला नहीं, जोड़ने वाला अपनी पहचान बनाता है।

गुरुवार, 26 अगस्त, 2021 भीलूड़ा

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