आध्यात्म ही सफल जीवन का आधार है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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अज्ञानता से अधर्म का जन्म होता है। इस अधर्मिता का एक स्वरूप आत्महत्या भी है। आजकल आत्महत्या एक जघन्य अपराध न होकर, हर आम या खास समस्या का हल बनता जा रहा है। विडंबना यह है कि अधिकांश लोग परिस्थिति से लड़ने के बजाय समस्या के आगे घुटने टेकने और स्वयं को समाप्त करना सही समझते हैं। जबकि यह आत्महत्या का भाव मानसिक और भावनात्मक दृढ़ता के अभाव एवं अपनी संकीर्ण सोच के कारण आता है। आप जानते हैं इसके पीछे मूल वजह क्या है? जीवन में आध्यात्म की कमी। जी हाँ,आध्यात्म ही है जो जीवन में मानसिक और भावनात्मक दृढ़ता प्रदान करता है। यही वह शक्ति है जो जीवन में आने वाले हर उतार-चढ़ाव और हर मनोभाव जैसे सुख-दु:ख, मैत्री-बैर, करूणा-तिरस्कार, क्रोध-क्षमा, हार-जीत, सफलता-असफलता आदि में भावनात्मक संतुलन बनाए रखती है। प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति में आध्यात्म जीवन का अभिन्न अंग था किंतु वर्तमान समय में इसका स्थान नगण्य है और इसी कारण हम हमारे चारों और नकारात्मकता और अराजकता का तांड़व देख रहे हैं। हमें पुन: हमारी भारतीय आध्यात्मिक जीवन शैली की ओर लौटकर जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण करना होगा। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह आध्यात्म क्या है? आध्यात्म अर्थात् आत्मस्थ भाव में जीना। निर्लिप्तता के साथ एक दृष्टा भाव से जीवन व्यतीत करना। अवचेतन मन की चेतन शक्ति को प्रकट करना ही आध्यात्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ सहज भाव से करने वाला व्यक्ति जब आध्यात्म के साथ सुख, शांति और समृद्धि को प्राप्त करता है तो जीवन में किसी भी तरह के तनाव, अवसाद से घिरने पर वह कभी भी आत्महत्या जैसे जघन्य कृत्य को करने की नहीं सोचता है। हर परिस्थिति का तटस्थ भाव के साथ सामना करके उस परिणाम को स्वीकार करता है। चारों पुरुषार्थों को करने वाला अपने जीवन में संतुलन बनाए रखता है। अच्छे-बुरे की पहचान करना उसे आ जाता है। शनै: शनै: वह आध्यात्म की ओर बढ़ता है। जीवन में आध्यात्म धारण करने वाले का आचरण, विचार, रहन-सहन, खान-पान शुद्ध होता है और वह जीवन के हर कार्य में संतुलन बनाए रखता है। अध्यात्म जियो और जीने दो की कला सिखाता है। सहज सरल स्वभाव और क्षमा के गुण को जाग्रत करता है। हर संकट को सहज भाव में लेने की कला सिखाता है। संकट और पाप के कारण जो अशुभ कर्म आते हैं उसमें हमें यह सोचने की शक्ति देता है कि जो हो रहा है वह मेरे ही कर्मों का फल है।
आज अमीर अधिक पैसों के कारण तो गरीब अपनी तंगहाली पर परेशान है सदा असंतोष के कारण दोनों के मन अवसाद से ही भरे रहते हैं। एक को पैसा खोने का डर, तो दूसरे को पैसा न होने का मलाल, बस इसी के बीच महत्वाकांक्षा जन्म लेती है और अमीर और अधिक पैसा कमाने व गरीब अचानक मालामाल बनने की सोचने लगता है। ऐसे में ही अराजकता और भ्रष्टाचार की उत्पत्ति होती है। यदि प्राचीन काल की तरह हमारी जीवन शैली में भी आध्यात्म का स्थान होता तो व्यक्ति अपनी स्थिति में संतोष के साथ जीता वह अर्थ का महत्व केवल जीवन निर्वाहन हेतु ही समझता तो धर्म के साथ अर्थोपार्जन कर काम और फिर मोक्ष हेतु पुरुषार्थ करता। परंतु आज स्थिति विपरीत है। पैसा ही सबकुछ है चाहे वह जैसे भी आया हो इसके बाद आता है भोग यानि काम, धर्म और मोक्ष तो युवा पीढ़ी के लिए वह शब्द हैं जिसके मायने केवल बुजुर्गों के लिए है। आज बचपन से ही कोई भी अपने बच्चे को शिक्षा के साथ आध्यात्मिकता का पाठ नहीं पढ़ाता है। और अगर कोई करे तो उसके इर्द-गिर्द के लोग ही कहने लगते हैं कि ध्यान ,आध्यात्म और धर्म की बातें बुजुर्गों का काम है। और सब यही सोचते हैं अभी स्कूली शिक्षा पर ध्यान दो ताकि आगे अच्छे कॉलेज में प्रवेश मिले और बेहतरीन प्रोफेशनल पाठ्यक्रम में महारथ हासिल कर वह अच्छे वेतन के साथ नौकरी पा ले या अपना स्वयं का व्यापार कुशलता से कर धनोपार्जन करे। हमने ही हमारी सोच से धर्म और आध्यात्मिक पुरुषार्थ के महत्व को जीवन से अलग कर दिया है। यदि आज कोई युवा गलती से भी आध्यात्मिक सोच लिए जीवन जीता है तो उसे निरीह बेववूसफ समझा जाता है। अल्प में संतोष करता है तो उसे प्रमादवादी कहा जाता है कि अपनी नाकाबिलियत को छुपाने के लिए उसने धर्म और आध्यात्म का चोंगा पहन रखा है जबकि सत्य इसके विपरित है। वह पुरूष ही सही मायने में पुरुषार्थी है जो इन चारों में संतुलन बना धर्म संगत कार्य करे। हम बच्चे को पैसा कमाने की मशीन बनाने की होड़ में उसे अच्छा इंसान बनाना भूल रहे है। और इन्हीं सब के कारण आ रही है मानसिक और भावनात्मक दुर्बलता, जरा सी असफलता तो व्यक्ति के वजूद को ही हिला देती है। वह बरबस ही आत्महत्या को गले लगाकर अपने इस जीवन को तो बिगाड़ता ही है, साथ ही अगले जीवन को भी स्वतःही कष्टमय बना देता है।

आध्यात्म की कमी के कारण आज सोच बहुत संकीर्ण हो गई है। अहंकार, ईष्र्या और क्रोध के भाव क्षण-क्षण में मन में जाग्रत हो उठते हैं। संयम का गुण तो नजर ही नहीं आता है जैसे अपनी उम्र से अधिक सोचना और शीघ्र सफलता पाना, इसमें असफलता की आशंका अधिक होती है। रोजमर्रा की जिंदगी में : घर के झगड़ों का तनाव ना झेल पाना , परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण ना हो पाना , व्यापार में नुकसान अथवा कर्जा न चुका पाना , असफल शादी अथवा प्रेम-प्रसंग , अपमान- धोखा मिलना इत्यादि कारण बेहद आम हैं। आज इस कोरोना काल में यही भय ग्रस्त लोग आत्महत्या को ही इस बीमारी का समाधान बना रहे हैं। समाचार पत्रिकाएँ इन्हीं स्वनाशिनी खबरों से भरी हुई हैं। यहां तक कि आज एक ३२वर्षीय तुर्की के फुटबॉल खिलाड़ी ने इस संशय में कि उसे कोरोना हो गया है अपने पुत्र की निर्मम हत्या कर दी। इसी कोरोना भय से वायु सेना के एक कर्मचारी ने फांसी लगाकर जान दे दी।
जीवन में आत्मचिन्तन और आध्यात्म की कमी के कारण यह सब हो रहा है। आत्मविश्वास कमज़ोर होने से ऐसे भाव जीवन में आते हैं। आत्मशक्ति और आध्यात्म से हर परिस्थिति से लड़ने की शक्ति मिलती है। जैसे तुम जीने के लिए पैसे का होना जरूरी मानते हो वैसे ही से जीवन सफलता पूर्वक उद्देश्य की पूर्ति हेतु ध्यान और आध्यात्म जरूरी है।

अनंत सागर

अंतर्भाव (भाग तीसरा )

15 मई 2020, शुक्रवार, उदयपुर

 

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