कहानी

“संतजन वंदनीय क्यों माने जाते हैं?’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

सूर्यकुल में भगवान राम के दादा अज बड़े दानी थे। वह प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भगवान की भक्ति किया करते…

अंतर्मुखी की झोली से श्रद्धा की जीत समझाती गुल्लिका अज्जि की कहानी

प्यारे बच्चों, आओ…आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। यह कहानी श्रद्धा और विश्वास की जीत की है। यह कहानी है गुल्लिका अज्जि की। तुम जानते हो इनके बारे में? नहीं न, तो आज मैं तुम्हें इन्हीं के बारे में बताता हूं।  बच्चों, आज से लगभग 1200 साल पहले दक्षिण में बेलगोला नाम का एक नगर था। आज इसे कई नामों से जाना जाता, जैसे श्रवणबेलगोला, बाहुबली, गोम्मटेश्वर आदि…। शायद तुमने इनमें से कोई एक नाम सुना हो। वहां भगवान बाहुबली की 57 फुट ऊंची प्रतिमा है, जो विंध्यगिरी पर्वत पर स्थित है। इसे चामुंडराय नाम के एक सेनापति ने बनवाया था। जब इस मूर्ति पहला मस्तकाभिषेक होने वाला था तो बच्चों, उस समय एक बड़ी ही अद्भुत घटना घटी। बाहुबली भगवान का अनेक घटों यानी घड़ों से अभिषेक किया जा रहा था। पर वह अभिषेक भगवान की मूर्ति के घुटनों से नीचे ही नहीं आ पा रहा था। सब चिंता में पड़ गए, कि आखिर यह क्या हुआ। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। तब उसी समय आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती ने कहा कि इस महोत्सव में कोई न कोई एक ऐसा व्यक्ति बचा है, जिसने अभी तक अभिषेक नहीं किया है। जब तक वह अभिषेक नहीं करेगा, तब तक मूर्ति का अभिषेक पूरा नहीं होगा। तभी उस भीड़ में एक बुढ़िया दिखी, सबकी निगाहें उस पर गई। उसने अभी तक अभिषेक नहीं किया था। वह हाथ में नारियल की छोटी सी नटी में दूध लेकर खड़ी थी। बच्चों, तुम्हें पता है कि उस बुढ़िया को अभिषेक के लिए ऊपर ले जाया गया। जैसे ही बुढ़िया ने नारियल की नटी से दूध भगवान के मस्तक पर डाला तो क्या देखते हैं कि पूरी की पूरी मूर्ति दूध से भीग गई। यही नहीं फिर उसी दूध की धारा से पहाड़ के नीचे एक तालाब भी बन गया। सबसे बड़ा चमत्कार तो यह हुआ कि बुढ़िया अभिषेक करते ही कहां गायब हो गई, किसी को पता ही नहीं चला, सब ढूंढते रहे। उसी समय आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती ने चामुंडराय सहित उपस्थित लोगों से कहा कि वह बुढ़िया और कोई नहीं, भगवान नेमिनाथ की यक्षणि कुष्मण्डनी देवी थी। वह तुम्हें उपदेश देने आई थी कि इस मूर्ति का अमीर-गरीब, हर कोई अपनी श्रद्धा से अभिषेक कर सकता। पैसा महत्व नहीं रखता, श्रद्धा महत्व रखती है। बच्चों, तुम्हें पता है कि इस बार और इसके पहले भी महामस्तकाभिषेक में वहां के भट्टारक चारूकीर्ति स्वामी जी ने इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए गुल्लिका अज्जि कलश रखा है। वह बुढ़िया गुल्लिका अज्जि के नाम के विख्यात है।  देखा बच्चों तुमने धर्म का प्रभाव। तो अब तुम इस कहानी को याद कर अपने मित्रों को भी सुनाना। और हां, अगर तुम्हें गुल्लिका अज्जि की प्रतिमा देखनी है तो फिर तुम श्रवणबेलगोला महामस्तकाभिषेक में जाना और वहां जाकर देखना। वहां भगवान बाहुबली की मूर्ति के ठीक सामने विंध्यगिरी पर्वत पर ही गुल्लिका अज्जि की प्रतिमा है। इसे चामुंडराय ने ही वहां पर रखवाया था।  तो देखा तुमने बच्चों कि कैसे श्रद्धा की जीत हुई और तुम्हें भी पूजा के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भगवान की पूजा के वक्त सामग्री के साथ विश्वास और श्रद्धा का महत्व सबसे अधिक है। इसलिए जब भी पूजा करो, सच्चे मन से करो, पूरी श्रद्धा से करो, यह मत सोचो कि मेरे पास पूजन की पूरी सामग्री है या नहीं है। अगली बार फिर एक नई कहानी के साथ मिलेंगे…  तुम्हारा अन्तर्मुखी
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