श्रावक

श्रावक : -पाप कर्म की निर्जरा के लिए करें प्रतिक्रमण-अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

परमात्मा और परमात्मा के उपदेश को मानने वाले मनुष्य को धर्म शास्त्रों में श्रावक शब्द से संबोधित किया गया है।…

‘अर्थ के ऐसे नियम जो धर्म-कर्म संवार दें!!’ अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

गृहस्थ श्रावक जीवनयापन हेतु धनोपार्जन करने के लिए कृषि, व्यापार आदि कर्म करता है। यह सत्य है की इनके बिना…

मानवता, एक नितांत आवश्यक संस्कार

एक मर्यादित व्यक्ति का आचरण जिसके खान-पान रहन- सहन, बोल-चाल से लोगों का तनाव दूर हो। जिसके संपर्क में आने से मानवता का विस्तार हो। जिसके अंदर अहिंसा, करुणा, दया और धर्म के प्रति आस्था व श्रद्धा हो। जो परमात्मा का दूत बनकर आया हो। जो दूसरों के दुखों को अपना दुख समझता हो। उसे मानव धर्म की भाषा में “श्रावक” कहते है। जो मानव अपने अंदर मानवता बनाए रखे उस मानव को धर्म में “श्रावक” कहा गया है। इस धरती पर करोड़ों मनुष्यों का जन्म होता है। किंतु सब ऐसे नहीं होते हैं। इसका मतलब मानव जीवन में जन्म के बाद उनमें मानवता के संस्कारों का बीजारोपण इसी धरती पर गर्भ से आरम्भ होता है। जैसे महाभारत काल में  अभिमन्यु जब गर्भ में था तो उनकी माँ ने चक्र व्यूह में घुसने की विधि श्रवण तो की किंतु जब व्यूह से  निकलने की विधि बताई जा रही थी तब उनकी निद्रा लग गई। परिणाम स्वरूप अभिमन्यु मात्र चक्र व्यूह में घुसना सीख सका पर निकलना नहीं। अंततः मृत्यु को प्राप्त हुआ।  इस घटना से यह स्पष्ट है कि जन्म के बाद बच्चे को बोलना, चलना, खाना-पीना, पसंद नापसंद  इत्यादि हर आचरण सिखाना नहीं पड़ता, इन में से और इससे जुड़ी कई  बातें वह स्वतः ही देखकर अथवा सुन-सुन कर सीख जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि शिशु गर्भ से ही सीखना आरम्भ कर देता है। पहले के समय में गर्भवती महिलाएं धार्मिक अनुष्ठान किया करती थीं, धर्म ग्रन्थ का पठन किया करती थीं। संतों के चरणों में बैठकर धार्मिक संस्कारों का श्रवण करती थीं । जिसके फलस्वरूप मानव के अंदर मानवता देखने को मिलती थी। किंतु आज परिस्थिति बदल गई है मानव का जन्म तो हो रहा है पर उनके अंदर की मानवता कहीं विलुप्त हो गई है। आज प्रतिदिन चारों ओर से आतंकवाद, क्रूरता, हिंसा का तांडव हो रहा है,  भूकंप,  महामारी,  मानसिक रोग बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति के साथ परिवार, समाज, देश एवं सम्पूर्ण विश्व का संतुलन बिगड़ रहा है। मानव ही मानव का शत्रु बन गया है। एक मानव की अंदर दूसरे मानव के प्रति अमानवीयता पैर पसार रही है । हर कोई एक दूसरे को दोषी बता रहा है। एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगा है।यहां तक कि देखा जा रहा है की एक बच्चा अपनी मां को स्वयं ही वृद्धाश्रम में छोड़ आता है। आज पैसा, सम्पत्ति और शीघ्र उन्नति पाने की लालसा में संतान अपने माता-पिता की हत्या तक कर डालती है। इससे वीभत्स और क्रूरतापूर्ण कृत्य और क्या हो सकता है ?? इन सब को रोकना है तो मानव को जन्म देने के साथ उसके अंदर मानवीय गुणों को जन्म देने का कर्तव्य भी पूरा करना होगा। धार्मिक शास्त्रों में मानव के अन्दर मानवता का जन्म करवा कर उसे श्रावक बनाने के अनेक संस्कारों का वर्णन मिलता है उसकी बात हम आगे की कड़ी में अवश्य करेंगे । -अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
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